
पुणे : नोबल हॉस्पिटल्स ॲन्ड रिसर्च सेंटर द्वारा अवयवदान प्रक्रिया और नियमावली (डिसीज्ड ऑर्गन डोनेशन,प्रोसेस, प्रोटोकॉल्स एंड केस-बेस्ड लर्निंग) इस विषय पर अस्पताल के सभागृह में एक सीएमई परिषद का आयोजन किया गया था. इसमें इस क्षेत्र से जुड़े 100 से अधिक लोगों ने भाग लिया.
इस कार्यक्रम का उद्घाटन नोबल हॉस्पिटल्स ॲन्ड रिसर्च सेंटर के अध्यक्ष व व्यवस्थापकीय संचालक डॉ. दिलीप माने, संचालक डॉ. दिविज माने, समूह कार्यकारी अधिकारी डॉ. संजय पठारे, जोनल ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन ऑफिसर आरती गोखले, रूबी हॉल क्लिनिक के न्यूरो क्रिटिकल केयर प्रमुख एवं सीनियर इंटेंसिविस्ट डॉ. कपिल झिरपे, सह्याद्री हॉस्पिटल की ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर मयुरी बारगे, झेडटीसीसी पुणे की सहसचिव एवं ट्रांसप्लांट सर्जन वृषाली पाटील, नोबल हॉस्पिटल्स के लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. मनोज श्रीवास्तव और वरिष्ठ किडनी रोग विशेषज्ञ एवं ट्रांसप्लांट फिजिशियन डॉ. अविनाश इग्नेशियस की उपस्थिति में किया गया.
झेडटीसीसी की जोनल ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन ऑफिसर आरती गोखले ने अवयव दान और उसके बाद की प्रक्रियाओं से संबंधित कार्यप्रणाली की जानकारी दी. साथ ही विभिन्न समितियों की भूमिका और जिम्मेदारियों पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि जब पुणे में 1997 में पहला ट्रांसप्लांट हुआ था, तब लोगों को मेंदूमृत की संकल्पना समझानी पड़ती थी. तब से लेकर आज तक हमने लंबा सफर तय किया है और अवयवदान के प्रति जनजागृति तथा संबंधित कर्मचारियों का नियमित प्रशिक्षण जारी रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है.
डॉ. कपिल झिरपे ने कहा कि अवयवदान से 8 जरूरतमंद मरीजों को नया जीवन मिल सकता है, इस भावना के कारण मृत मरीजों के प्रति लोगों का दृष्टिकोण बदला है. दाताओं की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ मेंदूमृत हुए मरीजों से दान किए जाने वाले अंगों की संख्या बढ़ाने पर भी ध्यान देना चाहिए. इसके लिए वरिष्ठ विशेषज्ञों की निगरानी में उचित दाता और प्राप्तकर्ता व्यवस्थापन आवश्यक है.
नोबल हॉस्पिटल्स ॲन्ड रिसर्च सेंटर के संचालक डॉ. दिविज माने ने कहा कि अवयवदान जागरूकता हमारे सभी जागरूकता कार्यक्रमों का एक प्रमुख हिस्सा रहा है. हाल ही में पिछले वर्ष गणेशोत्सव के दौरान हमारे 400 कर्मचारियों ने रिकॉर्ड समय में अवयवदान की शपथ ली.
